*हरतालिका तीज: 24 घंटे के निर्जला व्रत की तैयारी में सुहागनें, जानें कड़वा करेला खाने की खास वजह*
दुर्गुकोंदल। छत्तीसगढ़ में सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक हरतालिका तीज इस साल 26 अगस्त, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह त्योहार भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और पुनर्मिलन का प्रतीक है, जिसकी तैयारियां अब जोरों पर हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि महिलाओं की इच्छाशक्ति और सामुदायिक एकजुटता का अद्भुत उदाहरण है। योगाचार्य संजय वस्त्रकार कहते हैं,"तीज छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख परम्परागत त्योहार है, जो विशेष रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह पर्व स्त्री-पुरुष के पवित्र प्रेम, विवाहित जीवन में सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए समर्पित है। हरतालिका तीज का निर्जला व्रत शारीरिक कष्ट से कहीं आगे आत्मिक शुद्धि और मन की दृढ़ता का प्रतीक है। यह स्त्री की अपने संकल्प के प्रति अटूट निष्ठा को दर्शाता है, ठीक वैसे ही जैसे माता पार्वती ने शिव को पाने के लिए तपस्या की थी।"
*प्रमुख रीति रिवाज का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्ता*
मेहंदी: तीज पर हाथों और पैरों में मेहंदी लगाना एक शुभ परंपरा है।श्रृंगार: महिलाएं नए कपड़े और आभूषण पहनकर अपना श्रृंगार करती हैं। करेला भात: एक दिलचस्प परंपरा इस व्रत से एक दिन पहले करेला खाने की है। इसके पीछे दोनों ही, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक, कारण बताए जाते हैं।वैज्ञानिक दृष्टिकोण: आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. के व्ही गोपाल बताते हैं, "करेला एक ठंडी तासीर वाली सब्जी है और इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर में पानी की कमी को धीमा करते हैं। इसका सेवन डिहाइड्रेशन से बचाने में मददगार हो सकता है, जो 24 घंटे के निर्जला व्रत में एक बड़ी चुनौती है।"आध्यात्मिक दृष्टिकोण: मान्यता है कि करेले की कड़वाहट शरीर और मन की कठोर इच्छाओं और नकारात्मकताओं को दूर करने का प्रतीक है। इसकी कड़वाहट खाकर महिलाएं मन की शुद्धता और व्रत के प्रति अपनी समर्पण भावना को दृढ़ करती हैं।
*क्या है 'करू भात' की परंपरा?*
व्रत से पूर्व दिन, जिसे 'सिंजारा' या 'दिन सेवा' कहा जाता है, में महिलाएं करेले की सब्जी और चावल (भात) का सेवन करती हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'करू भात' कहा जाता है। यह शरीर को व्रत के लिए तैयार करने की एक पारंपरिक पद्धति है।
हरतालिका तीज का कठिन निर्जला व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण करने का विधान है। 27 अगस्त की सुबह पूजा-अर्चना और पारंपरिक व्यंजनों को भगवान शिव-पार्वती को भोग लगाने के बाद ही व्रत तोड़ा जाता है। मान्यता है कि यह व्रत सुहागिनों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देता है और कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर प्रदान करता है।इस तरह, हरतालिका तीज न सिर्फ आस्था का, बल्कि स्वास्थ्य और संकल्प का एक अनूठा संगम है, जो सदियों से नारी शक्ति की अदम्य भावना को प्रदर्शित करता आ रहा है।


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