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Durgkondal: वंदे मातरम् की 150 वीं वर्षगांठ केवल एक स्मरणीय अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, आत्मगौरव और मातृभूमि के प्रति समर्पण का जीवंत संदेश:-विकास राजु नायक*

 *वंदे मातरम् की 150 वीं वर्षगांठ केवल एक स्मरणीय अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, आत्मगौरव और मातृभूमि के प्रति समर्पण का जीवंत संदेश:-विकास राजु नायक* 



दुर्गूकोंदल | विकासखंड दुर्गूकोंदल के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय लोहत्तर में राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम की 150 वीं वर्षगांठ पर स्मरणोत्स्व कार्यक्रम आयोजित किया गया| जिसमें मुख्यरूप से जनपद सभापति एवं अध्यक्ष शाला प्रबंधन समिति विकास राजु नायक, प्राचार्य सुशील कुमार साहु, व्याख्याता श्यामसिँह नेगी, प्रधानअध्यापक रमेश कुमार सोनगेड़, रेणुका रामटेके, दिनेश ठाकुर, भोजराज वर्मा, दीपक ठाकुर चित्रांगद टांडिया, क्षेत्र के जनप्रतिनिधि,  कार्यकर्त्ता शामिल हुए | वंदे मातरम कार्यक्रम के 150वीं वर्षगांठ पर आधारित कार्यक्रम का शुभारंभ आज दिनांक 7 नवम्बर 2025 को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा किया गया, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का संबोधन सुना गया ततपश्चात वंदे मातरम गायन किया गया|स्मरणोत्स्व को सम्बोधित करते हुए विकास राजु नायक ने कहा कि- वंदे मातरम की 150 वीं वर्षगांठ पूरे देश के लिए गर्व और राष्ट्रभक्ति का अद्वितीय अवसर है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के मार्गदर्शन में इस ऐतिहासिक पर्व को वर्षभर चलने वाले महाअभियान के रूप में मनाया जा रहा है। देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी यह आयोजन जनभागीदारी के साथ चार चरणों में ग्राम पंचायत से लेकर राज्य स्तर तक भव्य रूप में संपन्न किया जाएगा। वंदे मातरम्” की 150 वीं वर्षगांठ केवल एक स्मरणीय अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, आत्मगौरव और मातृभूमि के प्रति समर्पण का जीवंत संदेश है। यह आयोजन छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी को भारत की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हुए उनमें देशभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रीय चेतना की भावना को और गहराई देगा। वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का स्वर है, जिसकी गूंज हर नागरिक के हृदय में नई ऊर्जा और गर्व का संचार करेगी, यह दिन प्रत्येक भारतीय के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने वंदे मातरम को एक प्रेरक आह्वान बताया जिसने पीढ़ियों को प्रेरित किया है और पूरे देश में देशभक्ति की स्थायी भावना को जागृ‍त किया है। वंदे मातरम की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने अक्षय नवमी, 7 नवंबर 1875 को की थी। यह पहली बार साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में उनके उपन्यास आनंदमठ के एक भाग के रूप में प्रकाशित हुआ था। मातृभूमि को शक्ति, समृद्धि और दिव्यता के प्रतीक के रूप में आह्वान करते हुए, यह गीत भारत की एकता और राष्ट्रीय गौरव का स्थायी प्रतीक बन गया| इस अवसर पर अजित कोषमा, तिलक साहु, टोमन ठाकुर, घनश्याम मरकाम, मनोज उसेंडी, रामदेव मंडावी, यशवंत साहु, प्रवीण दुग्गा, सुभाष हिड़को, पुष्पा भालेश्वर, एशवर्या दुबे, उक्खम सोनी, सोनिया कोवाची, रामदुलारी रावटे, डीकेश्वरी नेताम, भुनेश्वरी साहु, शिवप्रसाद कृषान, रमाशंकर नाग, कंवल पुरामे सहित समस्त स्कूली बच्चे शामिल हुए |

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