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KHAIRAGARH: उद्यानिकी विभाग की 'भ्रष्टाचार वाली नर्सरी': वेंडर ही बन गया मजदूर, रसूखदारों की तिजोरी भरने गरीबों के हक पर डाका

 उद्यानिकी विभाग की 'भ्रष्टाचार वाली नर्सरी': वेंडर ही बन गया मजदूर, रसूखदारों की तिजोरी भरने गरीबों के हक पर डाका


संवाददाता - मंदीप सिंह 

स्थान - खैरागढ़ 


खैरागढ़ | जिले का उद्यानिकी विभाग इन दिनों अपनी योजनाओं से ज्यादा अपने 'अजीबोगरीब' विरोधाभासों के कारण चर्चा में है। विभाग ने भ्रष्टाचार का एक ऐसा 'मॉडल' विकसित कर लिया है, जहाँ नियमों को ताक पर रखकर चहेते वेंडरों को दोहरा लाभ पहुँचाया जा रहा है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, जो रसूखदार परिवार अपनी दुकानों पर बैठकर विभाग को सामग्री की आपूर्ति कर रहा है, वही परिवार मस्टर रोल में 'श्रमिक' बनकर सरकारी खजाने में सेंध लगा रहा है। यह पूरा खेल विभाग की निगरानी प्रणाली और अधिकारियों की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।



मजदूरों के हक पर डाका और रसूखदारों को 'दिहाड़ी' का रेवड़ी वितरण

विभाग की कार्यप्रणाली में सबसे बड़ा विरोधाभास तब नजर आता है जब हजारों का टर्नओवर रखने वाले व्यवसायी जो स्वयं करदाता है मात्र 337 रुपये की दिहाड़ी के लिए सरकारी मस्टर रोल में कुदाल-फावड़ा चलाते हुए दर्ज पाए जाते हैं। नियम स्पष्ट हैं कि सामग्री प्रदाता (वेंडर) और उसका परिवार उसी कार्यस्थल पर श्रमिक के रूप में लाभ नहीं ले सकता, लेकिन यहाँ 'हितों के टकराव' को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। यह स्थिति न केवल वित्तीय अनियमितता है, बल्कि उन गरीब मजदूरों के हक पर सीधा प्रहार है जो रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, जबकि उनका हिस्सा विभाग के 'चहेते' डकार रहे हैं।


जिम्मेदार अधिकारी की ढाल और नियमों की सरेआम धज्जियां



इस पूरे गोरखधंधे को विभागीय संरक्षण किस कदर प्राप्त है, इसका अंदाजा ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी (REHO) के बयानों से लगाया जा सकता है। तथ्यों को स्वीकार करने के बजाय अधिकारी सरेआम रसूखदारों का बचाव करते हुए दावा कर रहे हैं कि 'काम किया है तभी नाम है'। सवाल यह उठता है कि क्या विभाग के पास 'हितों के टकराव' को जांचने का कोई पैमाना नहीं है? यह प्रशासनिक नियमों की खुली अवहेलना है कि जिस हाथ से विभाग सामग्री की खरीद कर रहा है, उसी हाथ को मजदूरी का भुगतान भी किया जा रहा है। क्या विभाग के पास संसाधनों का इतना अभाव था कि उसे सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र मजदूरों के बजाय उन रसूखदारों को देना पड़ा, जो पहले से ही वेंडर व करदाता के रूप में विभाग से लाभान्वित हो रहे हैं? यह दोहरा भुगतान न केवल वित्तीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सरकारी पारदर्शिता के दावों को भी झुठलाता है।"


उच्च कार्यालय की 'मौन' सहमति ने बढ़ाया भ्रष्टाचार का हौसला


मैदानी स्तर पर चल रहे इस 'कागजी खेल' की जानकारी होने के बावजूद जिला कार्यालय का मौन रहना इस पूरे मामले को और भी संदेहास्पद बनाता है। सहायक संचालक उद्यान (ADH) को इस विरोधाभास से अवगत कराने के लिए कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन  जब कॉल रिसीव हुआ तो उनका कहना था कि जानकारी लेकर कुछ बता पाऊंगी जिससे और भी विभाग की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा करता है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में हों और उच्च अधिकारी चुप्पी साध लें, तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि भ्रष्टाचार का यह 'उद्यान' ऊपर से नीचे तक की साठगांठ से लहलहा रहा है।


इनका क्या कहना है,मस्टर रोल में दर्ज नाम सही हैं


"मस्टर रोल में दर्ज व्यक्तियों ने वास्तविक रूप से कार्यस्थल पर शारीरिक श्रम किया है। उन्होंने मौके पर काम किया है तभी उनका नाम सूची में शामिल किया गया और उसी आधार पर भुगतान की प्रक्रिया पूरी की गई है। इसमें किसी भी प्रकार की अनियमितता या नियम विरुद्ध कार्य नहीं हुआ है।"

— संजय कुमार जांगड़े, REHO (उद्यानिकी विभाग)


जिले के आला अधिकारी ने साधी चुप्पी

इस पूरे मामले और 'हितों के टकराव' के गंभीर आरोपों पर जिले के मुख्य विभागीय अधिकारी -सहायक संचालक उद्यान (ADH) का पक्ष जानने हेतु उनके मोबाइल नंबर पर बार-बार कॉल किया गया, लेकिन जब कॉल रिसीव हुआ तो उनका कहना था कि इस मामले में मुझे अब तक कोई जानकारी नहीं जानकारी लेकर बता पाऊंगी ।

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