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Belgahana: बैगा आदिवासियों की बेबसी – टूटा पुल बना मौत का दरवाज़ा, सरकार देख रही मूक तमाशा!*

*खास खबर*

*बैगा आदिवासियों की बेबसी – टूटा पुल बना मौत का दरवाज़ा, सरकार देख रही मूक तमाशा!*


Cgvtv संवाददाता की विशेष रिपोर्ट


बेलगहना/करवा।

सरकार एक ओर मंचों से आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने की बड़ी-बड़ी घोषणाएँ करती नहीं थकती, मगर ज़मीनी सच्चाई इन वादों की पोल ऐसे खोल रही है कि सुनने वालों के कान खड़े हो जाएँ। बिलासपुर जिले की बेलगहना तहसील से महज़ 8 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत करवा के पास कटेलीपारा जाने वाली एकमात्र सड़क पर बना पुल पिछले 10 सालों से टूटा पड़ा है।



यह टूटा पुल अब बैगा आदिवासियों की ज़िंदगी और मौत का सवाल बन गया है। बारिश में हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि मरीज अस्पताल पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। एम्बुलेंस हो या ट्रैक्टर – कोई भी इस रास्ते से गुजरना मौत को दावत ही है। 


ग्रामीणों ने सालों से प्रशासनिक दरवाज़ों पर दस्तक दी, जनसमस्या निवारण शिविरों में गुहार लगाई, लेकिन नतीजा वही—सिर्फ आश्वासन की थाली परोसी गई, काम का एक भी निवाला नहीं मिला।



पूर्व में कांग्रेस नेता व कृषि उपज मंडी कोटा के अध्यक्ष संदीप शुक्ला के प्रयासों से खनिज न्यास व मंडी बोर्ड मद से इलाके में कई निर्माण कार्य हुए, जिससे यहां भी उम्मीदें जगी थीं। लेकिन सरकार बदलते ही प्रस्ताव फाइलों में दफन हो गया।


ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का साफ कहना है –

     अगर जनमन योजना के तहत इस मार्ग का डामरीकरण कर पुल का निर्माण नहीं हुआ तो बैगा आदिवासियों का यह इलाका हमेशा विकास से कटकर जंगल की अंधेर नगरी बना रहेगा।



आज हाल यह है कि ग्रामीण खतरनाक पहाड़ी किनारों से होकर जान हथेली पर रखकर गुजर रहे हैं। बारिश में भू-स्खलन और सड़क बह जाने का डर हर पल मौत का साया बनकर मंडराता है। वैकल्पिक मार्ग से ज्यादा दूरी सफर करने से अच्छा टूटे पुलिया से जान जोखिम में डाल पार करते हैं लोग। एक ओर एक घर तक सड़क निर्माण की बात कही जाती है तो वहीं 150 परिवारों को चलने टूटे पुल का मरम्मत आज तक नहीं कहां गया सुशासन तंत्र।


गुस्से से भरे ग्रामीणों ने चेतावनी दी है –

“अगर सरकार ने अब भी आंखें नहीं खोलीं तो बैगा आदिवासी सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करने मजबूर होंगे।”


अब सवाल उठता है – क्या सरकार बैगा आदिवासियों की तकलीफ सुनकर जागेगी, या फिर ये भोले-भाले लोग वोट की राजनीति में सिर्फ गिनती का हिस्सा बने रहेंगे?

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