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KHAIRAGARH: बकरकट्टा PHC कांड में अफसरों की 'नूराकुश्ती', BMO बोले- 9 तारीख को रिपोर्ट रिसीव करा दी, CMHO को पता ही नहीं; वनांचल की सेहत से खिलवाड़ के बीच रास्ते से कहां गायब हो गई जांच फाइल?

 बकरकट्टा PHC कांड में अफसरों की 'नूराकुश्ती', BMO बोले- 9 तारीख को रिपोर्ट रिसीव करा दी, CMHO को पता ही नहीं; वनांचल की सेहत से खिलवाड़ के बीच रास्ते से कहां गायब हो गई जांच फाइल?


संवाददाता - मंदीप सिंह 

स्थान - खैरागढ़ 


खैरागढ़। खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (KCG) जिले के अंतिम छोर पर स्थित वनांचल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बकरकट्टा में आदिवासियों की जिंदगी को दांव पर लगाने वाले जिम्मेदार अब खुद की प्रशासनिक जवाबदेही से बचने के लिए 'कागजी फुटबॉल' का खेल खेल रहे हैं। अस्पताल परिसर के भीतर जिम्मेदार अधिकारी के आराम फरमाने और उनकी मौजूदगी के दावों के बीच एक सफाईकर्मी द्वारा डॉक्टर की कुर्सी पर बैठकर ओपीडी संभालने तथा गरीब मरीजों की नस में सूई चुभाने का जो संगीन मामला सामने आया था, उस पर पर्दा डालने के लिए अब स्वास्थ्य महकमे के दो बड़े प्रशासनिक अफसरों के बयानों में ऐसा भारी विरोधाभास सामने आया है जिसने पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तारीख दर तारीख दावों का ऐसा जाल बुना गया है जिसमें खुद विभाग ही उलझता नजर आ रहा है और यह प्रशासनिक खींचतान साफ इशारा कर रही है कि वनांचल की भोली-भाली जनता को न्याय दिलाने के बजाय अफसरशाही अब 'तू डाल-डाल, मैं पात-पात' की तर्ज पर अपनी कुर्सियां सुरक्षित करने में जुट गई है।

इस पूरे संवेदनशील मामले में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब स्थानीय स्तर पर जांच अधिकारी और छुईखदान बीएमओ डॉ. मनीष बघेल से सीधे आधिकारिक सवाल किए गए। उन्होंने एक बड़ा बयान देते हुए ऑन-रिकॉर्ड दावा किया कि उन्होंने अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट दिनांक 07.07.2026 को ही सीएमएचओ कार्यालय के लिए रवाना कर दी थी और 09.07.2026 को जिला मुख्यालय में इस गोपनीय रिपोर्ट की बाकायदा रिसीविंग भी ली जा चुकी है। बीएमओ ने यह भी दलील दी कि मामले की गंभीरता को देखते हुए उस कथित सफाई कर्मचारी को तत्काल प्रभाव से केंद्र से हटाकर व्यवस्था को दुरुस्त करने का प्रयास किया गया है। लेकिन कहानी में सबसे बड़ा झोल तब उजागर हुआ जब इस संबंध में जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. आशीष शर्मा से सीधे संपर्क कर तस्दीक की गई। बीएमओ के दावों के ठीक विपरीत, सीएमएचओ डॉ. शर्मा ने स्पष्ट तौर पर कहा कि इस पूरे मामले की जांच के लिए टीम तो गठित की गई है, लेकिन उनके पास अब तक कोई भी जांच रिपोर्ट नहीं पहुंची है।


अधिकारियों के इन दो विपरीत बयानों ने अब जिला स्वास्थ्य विभाग को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है कि अगर बीएमओ के दावे के मुताबिक 9 जुलाई को ही रिपोर्ट जिला मुख्यालय में प्राप्त कराई जा चुकी है, तो हफ़्तों बाद भी वह रिपोर्ट मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की टेबल तक क्यों नहीं पहुंच सकी। क्या कार्यालय के भीतर ही कोई ऐसा रसूखदार धड़ा सक्रिय है जो इस संवेदनशील रिपोर्ट को दबाकर बैठा है या फिर बयानों के इस फेरबदल के पीछे कोई और प्रशासनिक मजबूरी काम कर रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक किसी अप्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा गलत नस में लगाया गया एक भी इंजेक्शन किसी गरीब ग्रामीण के लिए तत्काल जानलेवा साबित हो सकता है, ऐसे में विभाग द्वारा सिर्फ एक चतुर्थ वर्ग सफाईकर्मी को हटाकर त्वरित कार्रवाई का ढिंढोरा पीटना महज़ एक प्रशासनिक खानापूर्ति और लीपापोती नजर आता है।


सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न उस मुख्य प्रशासनिक मुखिया यानी केंद्र प्रभारी की जवाबदेही पर उठता है जिनकी नाक के नीचे यह पूरा काला खेल चल रहा था और जिनकी मूक सहमति के बिना कोई सफाईकर्मी डॉक्टर का स्टेथोस्कोप नहीं छू सकता। छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियमों को ताक पर रखकर, बिना किसी लिखित आवेदन के केवल 'मौखिक छुट्टी' के खेल के सहारे अस्पताल को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने वाले नदारद स्टाफ और जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कोई ठोस गाज नहीं गिरी है। क्षेत्र के जागरूक नागरिकों और ग्रामीणों के बीच यह अंदेशा और आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है कि इतनी जल्दबाजी में बंद कमरों में तैयार की गई इस कथित रिपोर्ट में जमीनी हकीकत और पीड़ितों के दावों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। फिलहाल, जिला कार्यालय के दस्तावेजों और बयानों के फेर में अटकी इस रिपोर्ट के आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक होने का इंतजार है, जिससे यह साफ हो सके कि क्या वाकई उन रसूखदार जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई होगी या फिर हर बार की तरह छोटे कर्मचारियों की बलि देकर इस पूरे कांड को भी ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया जाएगा।

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