Ticker

6/recent/ticker-posts

KHAIRAGARH: भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी 8 करोड़ की नहर, अधिकारी का गैर-जिम्मेदाराना बयान— 10 KM लंबी नहर है, हर हिस्से की बारीक देख-रेख संभव नहीं"

 भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी 8 करोड़ की नहर, अधिकारी का गैर-जिम्मेदाराना बयान— 10 KM लंबी नहर है, हर हिस्से की बारीक देख-रेख संभव नहीं"

संवाददाता - मंदीप सिंह 

स्थान - खैरागढ़ 





खैरागढ़ |  छत्तीसगढ़ में जल संसाधन विभाग की लापरवाही और ठेकेदारों की मनमर्जी का एक बड़ा मामला सिलपट्टी क्षेत्र से सामने आया है। सरकार द्वारा किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने और सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के दावों की जमीनी हकीकत इस कदर तार-तार हो चुकी है कि निर्माण के महज कुछ महीनों के भीतर ही 8 करोड़ रुपये की लागत से बनी नहर जर्जर होने लगी है। नहर के कंक्रीट स्ट्रक्चर पर जगह-जगह आई बड़ी-बड़ी दरारें साफ बयां कर रही हैं कि इस पूरे प्रोजेक्ट में गुणवत्ता को दरकिनार कर केवल कागजी कोरम पूरा किया गया है।


स्थानीय ग्रामीणों और किसानों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि इस भारी-भरकम बजट वाली योजना को पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया गया। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि जब नहर का निर्माण कार्य चल रहा था, तब विभाग के जिम्मेदार सब-इंजीनियर और एसडीओ  मौके पर निरीक्षण करने नहीं पहुंचे। अधिकारियों की इसी अनुपस्थिति का पूरा फायदा उठाते हुए ठेकेदार ने अपनी मनमर्जी चलाई और कंक्रीट के मिक्चर में सीमेंट की मात्रा कम कर बेहद घटिया दर्जे की रेत और गिट्टी का उपयोग किया। स्थिति यह है कि अभी तक इस नहर ने पानी का तेज बहाव देखा भी नहीं है और यह पहली ही बारिश या मामूली पानी छोड़ने पर पूरी तरह टूटने की कगार पर पहुंच चुकी है।


जब इस पूरे मामले और कंक्रीट में आई दरारों को लेकर संबंधित विभाग के जिम्मेदार अधिकारी से तीखे सवाल किए गए, तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय एक बेहद हैरान करने वाला और गैर-जिम्मेदाराना बयान दे डाला। अधिकारी ने दो टूक शब्दों में कहा कि नहर की कुल लंबाई 10 किलोमीटर है, जिसके लिए 8 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली है। अब चूंकि नहर 10 किलोमीटर लंबी है, इसलिए इसके हर पेच की बारीकी से देख-रेख करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। जिस स्थान पर दरारे आई है उसे तुड़वाया जायेगा 


अधिकारी के इस गैर-जिम्मेदाराना तर्क ने विभाग की कार्यप्रणाली को पूरी तरह कठघरे में खड़ा कर दिया है और पत्रकारिता के दृष्टिकोण से कई गंभीर सवाल पैदा होते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर 10 किलोमीटर के दायरे में हो रहे निर्माण की निगरानी नहीं की जा सकती, तो विभाग में तैनात तकनीकी अधिकारियों, इंजीनियरों और सुपरवाइजरों की फौज किस काम के लिए है? क्या उन्हें जनता के टैक्स के पैसे से वेतन सिर्फ दफ्तर में बैठने के लिए दिया जाता है? नियमानुसार, किसी भी सरकारी निर्माण कार्य के हर चरण का मूल्यांकन किया जाता है और उसे मेजरमेंट बुक में दर्ज करने के बाद ही ठेकेदार को भुगतान होता है। अगर अधिकारियों ने बारीकी से देख-रेख नहीं की, तो उन्होंने किस आधार पर ठेकेदार के करोड़ों रुपये के बिलों को हरी झंडी दे दी? यह सीधे तौर पर सांठगांठ और भ्रष्टाचार का मामला नजर आता है।


सिलपट्टी क्षेत्र के किसानों का कहना है कि अगर इस जर्जर हो चुकी नहर में पूरी क्षमता के साथ पानी छोड़ा गया, तो इन बड़ी-बड़ी दरारों के कारण नहर किसी भी वक्त बीच से टूट जाएगी। ऐसी स्थिति में 8 करोड़ की सरकारी राशि तो पानी में बहेगी ही, साथ ही नहर टूटने से आसपास के सैकड़ों एकड़ खेतों में खड़ी फसलें जलमग्न होकर पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगी। यानी किसानों को फायदा होने के बजाय भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है।

Post a Comment

0 Comments