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बहेरामुड़ा की बैगा महिलाओं ने थामी आत्मनिर्भरता की डोर

 


Cgvtv संवाददाता राम प्रताप सिंह की रिपोर्ट.....
कोटा, 05 अगस्त बेलगहना...

“हुनर हाथों में हो और हौसला साथ हो, तो गांव की मिट्टी से भी तरक्की की राह निकल आती है।” इसी सोच को जमीन पर उतारते हुए ग्राम बहेरामुड़ा (फुलवारीपारा) की बैगा जनजाति की महिलाओं को आजीविका और आत्मनिर्भरता की नई सौगात मिली है। जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था द्वारा संचालित गरिमा (ग्रामीण आत्मनिर्भर रोजगारी मंच) ने ‘आत्मनिर्भर पोषण’ परियोजना के तहत एकीकृत बकरी एवं मुर्गी पालन इकाई की स्थापना की है।

इकाई का विधिवत लोकार्पण गोपाल शरण सिंह तंवर, संयुक्त संचालक, पशु स्वास्थ्य सेवाएं, जिला बिलासपुर के करकमलों से किया गया। इसके साथ ही बैगा महिला स्व-सहायता समूह को इकाई की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब इसकी देखरेख, संचालन और प्रबंधन समूह की महिलाएं स्वयं करेंगी।


बकरी-मुर्गी के साथ कमाई की कई राह

यह सिर्फ बकरी और मुर्गी पालने की व्यवस्था नहीं, बल्कि ‘एकीकृत टिकाऊ खेती एवं आर्थिक आत्मनिर्भरता मॉडल’ है। इसमें बकरी पालन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन, जैविक खाद निर्माण और जैविक खेती को एक-दूसरे से जोड़ा गया है।

कहने को छोटा मॉडल, लेकिन सोच बड़ी है—

“खेत से खाद, खाद से फसल; बकरी-मुर्गी से आय, आय से खुशहाल परिवार।”

इस समन्वित व्यवस्था में एक गतिविधि से निकलने वाला संसाधन दूसरी गतिविधि के काम आएगा। इससे लागत कम करने, उत्पादन बढ़ाने, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग, पोषण सुरक्षा और वर्षभर आय के विविध साधन विकसित करने में मदद मिलेगी।


महिलाओं के हाथों में रोजगार की कमान

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गोपाल शरण सिंह तंवर ने कहा कि ऐसी पहल जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण, पशुपालन आधारित उद्यमिता और आत्मनिर्भर आजीविका को नई दिशा दे सकती है। उन्होंने जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि पशु स्वास्थ्य विभाग और संस्था भविष्य में मिलकर काम करेंगे, ताकि ग्रामीण एवं जनजातीय परिवारों को बकरी बीमा, बकरी पालन, गौ-पालन, डेयरी विकास और मुर्गी पालन सहित विभिन्न योजनाओं का अधिकतम लाभ मिल सके।

उन्होंने कहा कि विभाग और संस्था की साझेदारी से ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने, स्थानीय रोजगार के अवसर पैदा करने और गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

पलायन पर लगाम, गांव में रोजगार का इंतजाम

जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था के वरिष्ठ डॉ. गजानन फूटके ने कहा कि लगातार घटती कृषि जोत, बढ़ती आबादी और सीमांत व भूमिहीन परिवारों के सामने आजीविका का संकट बड़ी चुनौती बन रहा है। रोजगार के सीमित अवसरों के चलते ग्रामीणों को शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि बकरी, मुर्गी और मत्स्य पालन जैसे एकीकृत आजीविका मॉडल गांव में ही रोजगार और आय के अवसर पैदा कर सकते हैं। इससे पलायन घटेगा, पोषण बढ़ेगा और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी मजबूत होगी।


उन्होंने कहा—

“गांव आत्मनिर्भर होंगे, तभी देश आत्मनिर्भर होगा। स्थानीय संसाधनों पर आधारित ऐसे मॉडल समृद्ध और स्वावलंबी ग्रामीण भारत की मजबूत नींव हैं।”

एक इकाई, कई उम्मीदें

बहेरामुड़ा की यह पहल सिर्फ एक पालन इकाई की शुरुआत नहीं, बल्कि बैगा महिलाओं के लिए नई उम्मीद, नई जिम्मेदारी और नई पहचान की शुरुआत है। आज जहां महिलाएं समूह के रूप में इस इकाई की कमान संभाल रही हैं, वहीं आने वाले समय में यही मॉडल गांव की अन्य महिलाओं और परिवारों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।


बकरी पालन से आमदनी, मुर्गी पालन से पोषण, जैविक खेती से उत्पादन और महिलाओं की भागीदारी से आत्मनिर्भरता—बहेरामुड़ा में विकास का यह मॉडल अब आकार लेने लगा है।

कार्यक्रम में डॉ. आनंद रघुवंशी, पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञ, बेलगहना, डॉ. अनिमेश जायसवाल, पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञ, कोटा, एम. आर. पटेल एवं एस. पी. खरे, सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी, जनप्रतिनिधि, महिला स्व-सहायता समूहों की सदस्याएं, ग्रामीणजन एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।


जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था की ओर से डॉ. गजानन फूटके, अनिल बामने, अंशुल मिश्रा, वरिष्ठ मार्गदर्शक साथी एवं फील्ड टीम ने कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता निभाई।

बहेरामुड़ा से उठी यह पहल एक संदेश भी दे रही है—

“गांव में साधन, हाथों में हुनर;

मेहनत बनेगी आमदनी, आत्मनिर्भर होगा हर घर।”

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